उल्लास का शुभारम्भ

मित्रवर,

विभिन्न तरह के दुखों को समझने, सुलझाने और उसके विषय में मार्गदर्शन करने के लिए बहुत सारे ब्लॉग उपलब्ध हैं, किन्तु सुख को बांटने और बढ़ाने के लिए कोई ब्लॉग मुझे अभी तक विशेष रूप से हिंदी भाषा में देखने को नहीं मिला है.

जबकि यह एक सर्वमान्य तथ्य है कि सुख के अनुभवों को एक दूसरे से बांटने से दूसरों के जीवन में सुख की वृद्धि होने के साथ साथ हमारे जीवन में भी सुख बढ़ता है.

अतएव इसी अभिप्रेरणा से, जिसका वास्तविक उद्गम हमारे माननीय कुलपति महोदय प्रो. गिरीश्वर मिश्र जी के विचार हैं, मैंने यह ब्लॉग मनोविज्ञान विभाग की तरफ से मानविकी एवं सामजिक विज्ञान विद्यापीठ, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के संरक्षण में तैयार किया है.

इस ब्लॉग के सदस्य सुख, स्वतः स्फूर्त आतंरिक अनुभूति (जिससे उनके जीवन में नयापन आया, किसी कार्य विशेष में सफलता मिली, समस्याओं का समाधान मिल पाया) तथा सुख के विषय में नवीनतम मनोवैज्ञानिक तकनीकी (जैसे कि जीवन में प्रेम कैसे बढ़ाएं, परिवारवालों के साथ मिलजुलकर कैसे रहें, निजी जीवन में खुशहाली कैसे लाएं, दया भाव कैसे उपजाएँ, बच्चों में सकारात्मक गुण कैसे विकसाएं आदि ) के विषय में नवीनतम निष्कर्ष और विचार एक दूसरे के साथ बांटेंगे.

इसी उद्देश्य के साथ यह ब्लॉग आप और हम सबके बीच सुख के साझेदारी के लिए समर्पित है.


शुक्रवार, 16 जनवरी 2015

भारतीय होने का उल्लास


ह सूचित करते हुए मुझे बहुत ही हर्ष हो रहा है कि गुरुजनों के आशीष से मुझे गांधीनगर गुजरात में 7 से 9 जनवरी तक चले 13वें प्रवासी भारतीय सम्मलेन में शामिल होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ. 13वां प्रवासी भारतीय सम्मलेन बहुत ही विशेष था क्योंकि 100 वर्ष पूर्व 9 जनवरी को मोहनदास दक्षिण अफ्रीका से भारत आये थे. जिसके बाद उन्होंने मोहन से महात्मा तक का सफ़र तय किया. मुझे पहली बार इतने बड़े सम्मलेन में शामिल होने का मौका मिला जिससे मैं बहुत ही प्रसन्न था. वहां हम लोगों ने तीन दिनों तक ज्यादा से ज्यादा अप्रवासी भारतीयों से बात करने का प्रयास किया. प्रसन्नता इस बात की थी कि हम लोगों से ज्यादा बात करने की उत्सुकता उन अप्रवासी भारतीयों को थी. सभी की बातों से भारत छोड़ने का दर्द छलक रहा था.
प्रवासी भारतीय सम्मलेन को प्रारम्भ करने का श्रेय माननीय पूर्व प्रधानमंत्री पंडित श्री अटल बिहारी वाजपेयी को जाता है जिन्होंने सर्व प्रथम 2003 में ऐसे आयोजन की नीव रखी. 2003 से यह सम्मलेन अनवरत चल रहा है पूर्व के सभी सम्मेलनों की अपेक्षा इस बार लोगों संख्या अधिक थी.
मुख्य अतिथि गुयाना के राष्ट्रपति श्रीमान डोनाल्ड आर. रामअवतार थे जिन्हें इस बार के प्रवासी भारतीय सम्मान से सम्मानित किया गया. रामअवतार जी के संबोधन एवं अन्य भारतीय मूल के अप्रवासियों से बात करने पर यह स्पष्ट पता चल रहा था कि वर्तमान सरकार से भारतीयों के साथ-साथ अनिवासी भारतीयों को भी बहुत आशाएं एवं उम्मीदें हैं तथा उससे कहीं अधिक उनकी बातों में भरोसा झलक रहा था कि अब सब कुछ बदलेगा. प्रधानमंत्री के ऊर्जावान संबोधन ने उस भरोसे को और अधिक मजबूत कर दिया. हमें इस बात का गर्व होना चाहिए कि आज से शताब्दियों या उससे अधिक वर्ष पहले जिनके पूर्वज स्वेच्छा से या मजबूरी बस यहाँ से चले गए उनकी जवान पीढियां वापस हिंदुस्तान में अपनी जड़ों को तलाश रही हैं. यहाँ वापस बसना चाहते हैं यहाँ व्यापार करना चाहते है. यहाँ कही बम विस्फोट होता है तो वे रोते हैं, किसी दामिनी या निर्भया की इज्जत लुटती है तो वो शर्मिंदा होते हैं. हमें इस बात का अहंकार है कि हमारे पूर्वजों ने हमें ऐसे संस्कार दिए हैं कि तीन पीढ़ियों के बाद भी लोग यहाँ खिचे चले आते हैं.



 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें