ये तो है प्यारा बचपन.
इसमें है इतना उल्लास,
कि उसमे सिमटता है ये बचपन.
इसकी अभिलासएं अनेकों,
फिर भी ये है कितना न्यारा बचपन.
बचपन कि लीलाओं को देख
कितना उल्लसित होता है ये मन.
मन करता है कि फिर से पा जाएं वो बचपन.
बचपन कि किलकारी एवं आकांक्षाओं से भरता बचपन.
मन चाहे सब कुछ पाना,
क्योंकि सीमित है ये बचपन.
आगे बढ़कर है कुछ पाना.
यही सिखाता है ये बचपन.
ऊर्जा का भंडार लिए
खिलखिलाता है ये बचपन
खिलखिलाता है ये बचपन..
गौरव प्रताप सिंह
विज्ञानं- अध्यापक
हिल ग्रोव कॉल्स अकादमी
कोलिवरा
सुमेरपुर
राजस्थान
