उल्लास का शुभारम्भ

मित्रवर,

विभिन्न तरह के दुखों को समझने, सुलझाने और उसके विषय में मार्गदर्शन करने के लिए बहुत सारे ब्लॉग उपलब्ध हैं, किन्तु सुख को बांटने और बढ़ाने के लिए कोई ब्लॉग मुझे अभी तक विशेष रूप से हिंदी भाषा में देखने को नहीं मिला है.

जबकि यह एक सर्वमान्य तथ्य है कि सुख के अनुभवों को एक दूसरे से बांटने से दूसरों के जीवन में सुख की वृद्धि होने के साथ साथ हमारे जीवन में भी सुख बढ़ता है.

अतएव इसी अभिप्रेरणा से, जिसका वास्तविक उद्गम हमारे माननीय कुलपति महोदय प्रो. गिरीश्वर मिश्र जी के विचार हैं, मैंने यह ब्लॉग मनोविज्ञान विभाग की तरफ से मानविकी एवं सामजिक विज्ञान विद्यापीठ, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के संरक्षण में तैयार किया है.

इस ब्लॉग के सदस्य सुख, स्वतः स्फूर्त आतंरिक अनुभूति (जिससे उनके जीवन में नयापन आया, किसी कार्य विशेष में सफलता मिली, समस्याओं का समाधान मिल पाया) तथा सुख के विषय में नवीनतम मनोवैज्ञानिक तकनीकी (जैसे कि जीवन में प्रेम कैसे बढ़ाएं, परिवारवालों के साथ मिलजुलकर कैसे रहें, निजी जीवन में खुशहाली कैसे लाएं, दया भाव कैसे उपजाएँ, बच्चों में सकारात्मक गुण कैसे विकसाएं आदि ) के विषय में नवीनतम निष्कर्ष और विचार एक दूसरे के साथ बांटेंगे.

इसी उद्देश्य के साथ यह ब्लॉग आप और हम सबके बीच सुख के साझेदारी के लिए समर्पित है.


मंगलवार, 16 दिसंबर 2014

बचपन का उल्लास

बच्चों ये है कैसा बचपन,
ये तो है प्यारा बचपन.
इसमें है इतना उल्लास,
कि उसमे सिमटता है ये बचपन.

इसकी अभिलासएं अनेकों,
फिर भी ये है कितना न्यारा बचपन.
बचपन कि लीलाओं को देख
कितना उल्लसित होता है ये मन.
मन करता है कि फिर से पा जाएं वो बचपन.

बचपन कि किलकारी  एवं आकांक्षाओं से भरता बचपन.
मन चाहे सब कुछ पाना,
क्योंकि सीमित है ये बचपन.
आगे बढ़कर है कुछ पाना.
यही सिखाता है ये बचपन.

ऊर्जा का भंडार लिए
खिलखिलाता है ये बचपन
खिलखिलाता है ये बचपन..

गौरव प्रताप सिंह
विज्ञानं- अध्यापक
हिल ग्रोव कॉल्स अकादमी
कोलिवरा
सुमेरपुर
राजस्थान