उल्लास का शुभारम्भ

मित्रवर,

विभिन्न तरह के दुखों को समझने, सुलझाने और उसके विषय में मार्गदर्शन करने के लिए बहुत सारे ब्लॉग उपलब्ध हैं, किन्तु सुख को बांटने और बढ़ाने के लिए कोई ब्लॉग मुझे अभी तक विशेष रूप से हिंदी भाषा में देखने को नहीं मिला है.

जबकि यह एक सर्वमान्य तथ्य है कि सुख के अनुभवों को एक दूसरे से बांटने से दूसरों के जीवन में सुख की वृद्धि होने के साथ साथ हमारे जीवन में भी सुख बढ़ता है.

अतएव इसी अभिप्रेरणा से, जिसका वास्तविक उद्गम हमारे माननीय कुलपति महोदय प्रो. गिरीश्वर मिश्र जी के विचार हैं, मैंने यह ब्लॉग मनोविज्ञान विभाग की तरफ से मानविकी एवं सामजिक विज्ञान विद्यापीठ, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के संरक्षण में तैयार किया है.

इस ब्लॉग के सदस्य सुख, स्वतः स्फूर्त आतंरिक अनुभूति (जिससे उनके जीवन में नयापन आया, किसी कार्य विशेष में सफलता मिली, समस्याओं का समाधान मिल पाया) तथा सुख के विषय में नवीनतम मनोवैज्ञानिक तकनीकी (जैसे कि जीवन में प्रेम कैसे बढ़ाएं, परिवारवालों के साथ मिलजुलकर कैसे रहें, निजी जीवन में खुशहाली कैसे लाएं, दया भाव कैसे उपजाएँ, बच्चों में सकारात्मक गुण कैसे विकसाएं आदि ) के विषय में नवीनतम निष्कर्ष और विचार एक दूसरे के साथ बांटेंगे.

इसी उद्देश्य के साथ यह ब्लॉग आप और हम सबके बीच सुख के साझेदारी के लिए समर्पित है.


गुरुवार, 23 अक्टूबर 2014

सकारात्मक कार्यों के लिए संकोच के त्याग का उल्लास

उल्लास के सम्मानित सहभागी

मैं कल नागपुर से हरिद्वार आने के लिए छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस से यात्रा  कर रहा था. सुबह के लगभग छह बजे ट्रेन भोपाल के आसपास पहुँच गयी. अपनी नियमित दिनचर्या के अनुसार योगासन करने के लिए मेरा मन अकुलाने लगा. किन्तु मन में कुछ विरोधी विचार उठाने लगे जैसे कि मुझे आसन करते हुए देखकर लोग क्या कहेंगे? क्या वे मुझ पर हँसेंगे नहीं? आदि-आदि ....

किन्तु, थोड़ी देर में मन की दुविधा पर योगेच्छा ने विजय पायी और मैंने दरवाजे के पास चादर बिछाकर आसन करना शुरू कर दिया. आश्चर्य की बात यह थी कि लोग मुझे प्रशंसापूर्ण दृष्टि से देखने लगे. कुछ लोगो ने तो मुझ से योग के विषय में बातचीत भी करनी शुरू कर दी. यह देखकर मन उल्लास से भर गया और यह संकल्प जगा कि उचित कार्यों के लिए झूंठे संकोच का त्याग किया जाएगा तभी तो संभव हो पायेगा अपने स्व को अभिव्यक्त कर पाना.

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