मैं कल नागपुर से हरिद्वार आने के लिए छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस से यात्रा कर रहा था. सुबह के लगभग छह बजे ट्रेन भोपाल के आसपास पहुँच गयी. अपनी नियमित दिनचर्या के अनुसार योगासन करने के लिए मेरा मन अकुलाने लगा. किन्तु मन में कुछ विरोधी विचार उठाने लगे जैसे कि मुझे आसन करते हुए देखकर लोग क्या कहेंगे? क्या वे मुझ पर हँसेंगे नहीं? आदि-आदि ....
किन्तु, थोड़ी देर में मन की दुविधा पर योगेच्छा ने विजय पायी और मैंने दरवाजे के पास चादर बिछाकर आसन करना शुरू कर दिया. आश्चर्य की बात यह थी कि लोग मुझे प्रशंसापूर्ण दृष्टि से देखने लगे. कुछ लोगो ने तो मुझ से योग के विषय में बातचीत भी करनी शुरू कर दी. यह देखकर मन उल्लास से भर गया और यह संकल्प जगा कि उचित कार्यों के लिए झूंठे संकोच का त्याग किया जाएगा तभी तो संभव हो पायेगा अपने स्व को अभिव्यक्त कर पाना.
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