उल्लास का शुभारम्भ

मित्रवर,

विभिन्न तरह के दुखों को समझने, सुलझाने और उसके विषय में मार्गदर्शन करने के लिए बहुत सारे ब्लॉग उपलब्ध हैं, किन्तु सुख को बांटने और बढ़ाने के लिए कोई ब्लॉग मुझे अभी तक विशेष रूप से हिंदी भाषा में देखने को नहीं मिला है.

जबकि यह एक सर्वमान्य तथ्य है कि सुख के अनुभवों को एक दूसरे से बांटने से दूसरों के जीवन में सुख की वृद्धि होने के साथ साथ हमारे जीवन में भी सुख बढ़ता है.

अतएव इसी अभिप्रेरणा से, जिसका वास्तविक उद्गम हमारे माननीय कुलपति महोदय प्रो. गिरीश्वर मिश्र जी के विचार हैं, मैंने यह ब्लॉग मनोविज्ञान विभाग की तरफ से मानविकी एवं सामजिक विज्ञान विद्यापीठ, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के संरक्षण में तैयार किया है.

इस ब्लॉग के सदस्य सुख, स्वतः स्फूर्त आतंरिक अनुभूति (जिससे उनके जीवन में नयापन आया, किसी कार्य विशेष में सफलता मिली, समस्याओं का समाधान मिल पाया) तथा सुख के विषय में नवीनतम मनोवैज्ञानिक तकनीकी (जैसे कि जीवन में प्रेम कैसे बढ़ाएं, परिवारवालों के साथ मिलजुलकर कैसे रहें, निजी जीवन में खुशहाली कैसे लाएं, दया भाव कैसे उपजाएँ, बच्चों में सकारात्मक गुण कैसे विकसाएं आदि ) के विषय में नवीनतम निष्कर्ष और विचार एक दूसरे के साथ बांटेंगे.

इसी उद्देश्य के साथ यह ब्लॉग आप और हम सबके बीच सुख के साझेदारी के लिए समर्पित है.


शनिवार, 22 नवंबर 2014

हार की जीत का उल्लास

बंधुओं. . . .
   मेरे गाँव का क्रिकेट टूर्नामेंट चल रहा था, आखिरी मैच अर्थात फाइनल मेरे गाँव की टीम एवं मेरे पड़ोस के गाँव की टीम को प्रवेश मिला था. संयोग से प्रारंभिक मैचों में मैंने उस गाँव की टीम से एक मैच खेला था. चूँकि कुछ आतंरिक कारणों की वजह से मुझे अपने गाँव की टीम से नहीं खेलना था. शाम के समय पड़ोस के गाँव का प्रधान मेरे घर आया और उसने मुझे उनकी टीम की तरफ से खेलने के लिए कहा. प्रधान जी उम्र लगभग ६५ साल थी मैंने उनसे दबाव बस हाँ तो कह दिया परन्तु मैच के प्रारम्भ होने से पहले तक मेरे गाँव के लोगों एवं साथ के मित्रों का जबरदस्त दबाव एवं विरोध, पापा ने भी मुझे एक बार मना किया और मैंने लगभग उनकी तरफ से न खेलने का मन बना लिया था. परन्तु क्रिकेट शुरू होने पूर्व प्रधान जी ने मुझे फिर कहा और मैं बिना हिचकिचाहट के उनके साथ खेलने चला गया. मैच समाप्त हुआ दुर्भाग्य से हम लोग हार गए परन्तु ५२ रन बनाए की वजह से मैंन ऑफ़ द मैच मुझे चुना गया .
      उसके बाद से आज तक मैं जब भी उन प्रधान जी महोदय को देखता हूँ या वो मुझे देखते हैं उनका  मुझसे ऐसे बात करना जैसे मैंने उनकी बहुत बड़ी मदद कर दी हो , उनकी विनम्रता , उनका मेरे लिए आकर्षण मेरे जीवन का सबसे बड़ा मैंन ऑफ़ द मैच रहा .मैं जब भी उनको देखता हु तो वह आज से ८ साल पुराना क्रिकेट मैच मेरी आँखों के सामने पुनः जिवंत हो जाता है .आज भी यदि वो मुझसे कभी भी बात करते है तो उस मैच का जिक्र जरूर करते है.
द्वारा

महेश तिवारी,  एम. फिल छात्र  

मदद से मिला उल्लास

जब मैं 11 वी कक्षा मे था तब मेरे दोस्त को कुछ पैसो की जरूरत थी। उस समय मेरे पास सिर्फ 50 रु थे जो की उस समय मेरे लिए बहुत थे। लेकिन मेरे दोस्त को ज्यादा पैसो की जरूरत थी जिस वजह से वह बहुत परेशान था। तब मैंने उससे कहा मेरे पास 50 रु है तुम रख लो। और मैंने कहा मुझे आज कोई कम नहीं है तुम रख लो तुम्हारा थोड़ा काम हो जाएगा। तो वह मेरे पास से पैसे नहीं ले रहा था, क्योंकि वह जानता था की मेरे पास पैसे नहीं रहते  और मेरे पास जो भी है मैं उसे पूरा दे रहा था। मैंने उसे कहा की देख भाई आज मुझे पैसो की कोई जरूरत नहीं है आज तुम्हें जरूरत है तो तुम रख लो । मुझे  कल जरूरत होगी तो मई कल सोचुंगा। मैंने उसे पैसे दे दिये। उस समय मौजे बहुत अच्छा लगा और मेरे मन मे गजब का उल्लास  महसूस हो रहा था. आज वही दोस्त मुझ से कहता है जब भी जरूरत हो पैसो की तो मांग लेना। और मैंने उससे पैसे लिए भी है। पैसे देते वक्त वह मुझ से कहता भी है की मैं  वो तेरे 50 रु नहीं दूंगा । क्योकि वो  तेरे 50 रु मेरे लिए बहुत कीमती थे , मैं आज उसकी कोई कीमत नहीं लगा सकता और न हिन मैं वापस करूंगा। तेरे वो 50 रु मैं  जिंदगी मे  कभी नहीं  भूलूँगा।

द्वारा
कमलशिष मोदक, एम.फिल छात्र

बुधवार, 19 नवंबर 2014

आइये जीवन मे अर्थ तलाशें

मित्रवर,

 कल मेरा मन निराश सा  था. अपने कार्य की महत्ता को लेकर तीव्र प्रश्न उमड़-घुमड़ रहे थे. किंतु जब मैंने कल ISO Certification  से सम्बंधित व्याख्यान, जो की विश्वविद्यालय मे शैक्षणिक गुणवत्ता को लेकर था, से ऐसा लगा कि हमारे अध्यापन के व्यवसाय मे भी कुछ बेहतर करने की सम्भावना मौजूद है तो मन में उल्लास का संचार हुआ. पुनः मै सहज हो पाया.

तो आइये हम जीवन में अर्थ तलाशें और उल्लास को पायें.

आपका साथी,

अरुण

शनिवार, 1 नवंबर 2014

अच्छा सोचें और उल्लास से सराबोर हो जायें

मित्रों,
आज सुबह से ही मेरे मन में एक विचार बार-बार निनादित हो रहा है. वह विचार है संघर्ष नही बल्कि साझेपन का, प्रतियोगिता नही परस्पर सहयोग का. क्या ऐसा सम्भव हो सकता है कि हम पावर नहीं बल्कि प्यार के लिये काम करें? किसी पर प्रभाव नहीं बल्कि प्रेम जमायें. पता नही कि यह सब सम्भव है कि नहीं किंतु एक बात मैंने अपने मन के तल पर पक्के तौर पर महसूस की. वह थी उल्लास और शांन्ति की स्थिति. तभी मुझे ऋषियों की उस वाणी की सार्थकता महसूस हुई और वह थी सर्वे भवंतु सुखिनः की भावना. आइये अच्छा सोचें और उल्लास से सराबोर हो जायें.

आपका साथी,

अरुण